अलग -अलग पार्टियों का किसी 'एक कारण' के लिए साथ आना कभी भी आसान काम नहीं होता है। लेकिन कई बार उन्हें साथ आना पड़ता है, क्योंकि उनके कार्यकर्ता और वोटर्स भी ऐसा चाहते हैं। आजकल देश भर में यह चर्चा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस, सपा-बसपा, टीएमसी, राजद, टीडीपी, एनसीपी, आरएलएसपी जैसे 23 छोटे-बड़े ऐसे दल एक साथ आये हैं, जिनकी विचारधारा एकसमान नहीं है। यह बात आंशिक रूप से सच भी है। लेकिन इनमें से कुछ दल पहले भी यूपीए सरकार में साथ रह चुके हैं. इसके अलावा इन दलों में से ज्यादा का दायरा एक राज्य तक ही सीमित है. लेकिन दूसरा सच यह भी है कि ये सारे दल 'झूठे प्रचार के सहारे चल रही एक सरकार' को रोकने आयी है। मौजूदा मोदी नित एनडीए सरकार जनपक्षधर होने का दावा तो करती है, लेकिन युवाओं के लिए इनके पास 'रोजगार' नहीं है। बड़े-बड़े मित्र उद्योगपतियों के लिए तो इस सरकार के पास 'कई ऑफर' हैं, लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए जीएसटी जैसा कठोर टैक्स सिस्टम। अपनी मजबूती दिखाने के चक्कर में बिना किसी होमवर्क के देश की जनता पर जीएसटी का ब...
डियर रांची, नमस्कार यह पत्र मैं आपको इसलिए लिख रहा हूं कि कल किसी अखबार, वेबसाइट या पत्रिका में अपनी कविता, कहानी प्रकाशित करवाने के लिए फोन करने से पहले, एकबार खुद से यह सवाल जरूर कीजियेगा कि आप साहित्य से, उन रचनाओं से कितना प्रेम करते हैं? मैं जानता हूं कि आपकी आबादी 12 लाख से भी ज्यादा है. आपके यहां देशभर के कुछ नामी कॉलेजेज, स्कूल्स हैं. केंद्रीय विश्वविद्यालय व रांची विश्वविद्यालय समेत कई यूनिवर्सिटिज हैं. ऐसे में दो-चार हजार साहित्य व कला प्रेमियों का एक जगह एकत्रित हो जाना कौन-सी बड़ी बात होगी? आपके ही हार्ट में बसे ऑड्रे हाउस को ढूंढ़ते हुए 8 दिसंबर की सुबह 11:25 में जब मैं वहां पहुंचा, तो उम्मीद कर रहा था कि मुझे दर्शक/श्रोता दीर्घा में बैठने की जगह शायद न मिले, क्योंकि मैं कार्यक्रम शुरू होने की टाइमिंग से पूरे 25 मिनट की देरी से ऑड्रे हाउस पहुंचा था. टाटा द्वारा आयोजित दूसरे 'झारखंड लिटररी मीट' के अतिथियों की लिस्ट देख कर मैं सोच रहा था कि रांची की साहित्यप्रेमी जनता वहां काफी संख्या में पहुंच गयी होगी. लेकिन मेरा यह अनुमान थोड़ा-सा गलत निकला. दरअस...