आज वर्ष 2018 की पहली सितंबर है। यहां से वर्ष 2019 के लोकसभा आम चुनाव में लगभग नौ महीने का समय शेष है। ऐसे में देश की वर्तमान राजनीति और इससे जुड़े विषयों पर बात करना एक 'जरूरी काम' है। जरूरी तो पहले भी था, लेकिन यह परीक्षा से पहले की तैयारी की तरह है। क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ वोट दे देने भर से आपका भार कम नहीं हो जाता है। लोकशाही की मजबूती के लिए आपको वोट देने से पहले गहण अध्ययन की भी जरूरत होती है। ताकि आप वोट देते समय सही निर्णय ले सकें। अन्यथा वोट देकर अगले पांच वर्षों तक पछताने के अलावा आपके पास और क्या रहेगा?
यह काम ठीक उसी तरह जरूरी है, जैसे- सुबह जाग कर आप सबसे पहले फ्रेश होते हैं, फिर थोड़ी एक्सरसाइज या योगा कर चाय या अन्य पेय पदार्थ लेते हैं, फिर नाश्ता कर काम पर जाते हैं. इस तरह एक दिन की शुरुआत होती है। इस शुरुआत से लेकर रात को सोने के लिए बेड पर जाते समय तक आप उस दिन को पूरा कर चुके होते हैं। मेरे हिसाब से रात वह नहीं, जब अंधेरा होता है, बल्कि रात वह है, जब हम सो जाते हैं, या सोये रह जाते हैं।
अब अगर दिन वाले हिस्से को यदि एक पूरी जिंदगी मान लिया जाये, तो सोच कर देखियेगा कि आपकी जिंदगी कैसी रही? क्या आप उसे और बेहतर बना सकते थे? यदि आप उसे बेहतर बनाने में कामयाब रहे तो क्या कारण थे और यदि बेहतर बनाने में असफल रह गये, तो क्या कारण थे?
खैर, इन बातों के जरिये मेरा कहने तात्पर्य है कि देश की 'राजनीति' ऐसी चीज है, जो हमारी जिंदगी को हर स्तर पर प्रभावित करती है। चाहे आप किसान हैं, चाहे व्यापारी, चाहे नौकरीपेशा या फिर बेरोजगार, सबकी जिंदगी में राजनीति दखल देती है। अब रेगुलर वर्ष 2019 के आम चुनाव तक ब्लॉगिंग के जरिये मैं देश की राजनीति, उससे जुड़े मुद्दों को डिकोड कर या कह दें कि सरल भाषा में अपने नये ब्लॉग 'पॉलिटिकल पंडित' पर लिखता रहूंगा। हालांकि, मैं बता देना चाहता हूं कि मैं राजनीति विज्ञान का बड़ा ज्ञाता नहीं हूं, क्योंकि मास्टर्स तक मेरी शिक्षा-दीक्षा विज्ञान के विषयों में हुई है। लेकिन पत्रकारिता की पढ़ाई और उसके बाद के चार वर्षों से लगातार देश की राजनीति पर गहण दृष्टि बनाये हुए हूं।
विज्ञान ने मुझे इस बात की समझ दी कि किसी थ्योरी को तब तक नहीं मानो, जब तक उसका प्रायोगिक प्रमाण न हो। वहीं पत्रकारिता ने मुझे निडर होकर सवाल पूछना सिखाया है। चार वर्षों की पत्रकारिता की नौकरी के दौरान कुछ माह के लिए मैं देश के कुछ बड़े न्यूजरूम और मीडिया संस्थानों का हिस्सा रहा हूं। लेकिन दुख के साथ लिख रहा हूं कि पत्रकारिता का स्तर दिनोंदिन गिरा है। प्रो-पीपल यानी जनपक्षीय पत्रकारिता का स्कोप धीरे-धीरे मेनस्ट्रीम से खत्म होता जा रहा है। इसे बचाने के लिए कई पत्रकार विकल्प भी तलाश रहे हैं। लेकिन धन संकट, अपने परिवार के प्रति उनकी जिम्मेवारी उनके पांव में बेड़ियां डालने का काम करती हैं।
एक तरफ उम्मीद की किरण बन कर न्यू-मीडिया यानी ऑनलाइन मीडिया (ब्लॉगिंग, वेबसाइट्स) आये। लेकिन ऑनलाइन मीडिया और सोशल मीडिया के अच्छे और बुरे दोनों चेहरे अब हमारे सामने हैं। एक तरफ तो यह लोकतांत्रिक दिखता है, लेकिन झूठी खबरों के प्रसार की वजह से इसकी छवि खराब भी है। इसके पीछे की बड़ी वजह इन माध्यमों का अति लोकतांत्रिक होना भी है। फिर भी यह नाउम्मीद होने का समय नहीं है, क्योंकि तकनीक हमेशा नये रास्तों का जन्मदाता रहा है। खास बात है कि माध्यम तभी कारगर साबित होंगे, जब उससे मिलनेवाली सूचनाओं को ग्रहण करनेवाला व्यक्ति जागरूक होगा।
संचार की दुनिया में मशहूर मार्शल मैकलुहान का एक चर्चित कथन है- मीडियम इज मैसेज। यानी, माध्यम ही संदेश है। अब आप सोचेंगे कि भला माध्यम संदेश कैसे हो सकता है। लेकिन यह जानना बहुत जरूरी है कि आप जो सूचना रोज प्राप्त कर रहे हैं, उसका माध्यम क्या है, कौन है? पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान हर पत्रकार को निष्पक्ष होकर खबर लिखने की सीख दी जाती है। किसी खबर का विश्लेषण करते हुए भी पत्रकार से उम्मीद होती है कि वह पाठक के बीच हर विचार के तथ्यों को परोस दे, अब वहां पाठक अपने विवेक से तय करेगा कि उसे रोटी खाना है या चावल। लेकिन क्या आज पत्रकारिता की दुनिया में ऐसा हो पा रहा है?
अगर नहीं? तो इसके लिए सिर्फ पत्रकार दोषी नहीं हैं, आप पाठक भी इसके लिए बराबर के दोषी हैं। क्यों पाठक दोषी हैं, इसका जवाब कभी और दूंगा, तब तक आप खुद से सोचिएगा। उपरोक्त विवरण को आप एक तरह से इंट्रोडक्ट्री मान लीजिए। अब रोज नये-नये आलेख और मुद्दों के साथ आपसे मुलाकात होगी। आपकी टिप्पणियां स्नेह का काम करेगी, इसलिए यदि आप मेरे आलेख पढ़ते हैं, तो टिप्पणी भी करें।
विवेकानंद सिंह (हंसमुख भाई)
पत्रकार, रांची
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