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रांची के साहित्यप्रेमियो आपके उत्साह को देखने से मैं वंचित रह गया!

डियर रांची, नमस्कार

यह पत्र मैं आपको इसलिए लिख रहा हूं कि कल किसी अखबार, वेबसाइट या पत्रिका में अपनी कविता, कहानी प्रकाशित करवाने के लिए फोन करने से पहले, एकबार खुद से यह सवाल जरूर कीजियेगा कि आप साहित्य से, उन रचनाओं से कितना प्रेम करते हैं?

मैं जानता हूं कि आपकी आबादी 12 लाख से भी ज्यादा है. आपके यहां देशभर के कुछ नामी कॉलेजेज, स्कूल्स हैं. केंद्रीय विश्वविद्यालय व रांची विश्वविद्यालय समेत कई यूनिवर्सिटिज हैं. ऐसे में दो-चार हजार साहित्य व कला प्रेमियों का एक जगह एकत्रित हो जाना कौन-सी बड़ी बात होगी?

आपके ही हार्ट में बसे ऑड्रे हाउस को ढूंढ़ते हुए 8 दिसंबर की सुबह 11:25 में जब मैं वहां पहुंचा, तो उम्मीद कर रहा था कि मुझे दर्शक/श्रोता दीर्घा में बैठने की जगह शायद न मिले, क्योंकि मैं कार्यक्रम शुरू होने की टाइमिंग से पूरे 25 मिनट की देरी से ऑड्रे हाउस पहुंचा था. टाटा द्वारा आयोजित दूसरे 'झारखंड लिटररी मीट' के अतिथियों की लिस्ट देख कर मैं सोच रहा था कि रांची की साहित्यप्रेमी जनता वहां काफी संख्या में पहुंच गयी होगी.

लेकिन मेरा यह अनुमान थोड़ा-सा गलत निकला. दरअसल, मुझे याद है पिछले दिनों एक ज्वेलरी शॉप के उद्घाटन के लिए फिल्म अभिनेत्री कटरीना कैफ रांची आयीं थीं. तब उनको बस एक झलक देखने के लिए ऐसा लगा कि पूरा शहर सड़कों पर आ गया हो. यहां तक कि प्रशासन को ट्रैफिक रूट बदलने पड़ गये थे. मुझे उस दिन इतना एहसास हो गया था कि रांची में लोगों के पास समय का आभाव तो बिल्कुल भी नहीं है.

लेकिन जब मैं लिटररी मीट में कार्यक्रम स्थल पर पहुंचा, तो पाया कि मेरे बैठने के लिए वहां पर्याप्त जगह मौजूद है. वैसे भी कटरीना वाली भीड़ की उम्मीद तो मैं कर भी नहीं रहा था, लेकिन लगा कि जिन लोगों को मीडिया से अक्सर शिकायत होती है कि मीडिया ने साहित्य, कविता, आर्ट को दिखाना, बताना छोड़ दिया है. वे लोग तो कम-से-कम इस कार्यक्रम में उत्साहित होकर जरूर पहुंचे होंगे. मैंने श्रोताओं की ओर नजर दौड़ाया, तो पाया कि वहां लगभग 60 से 70 फीसदी स्कूली छात्र मौजूद हैं. मैं भी जाकर श्रोताओं के मध्य बैठ गया. उस समय रस्किन बांड और उदय प्रकाश मीट की औपचारिक शुरुआत कर रहे थे.

स्कूली बच्चों का वहां होना बता रहा था कि रस्किन बांड रांची के घर-घर में खासे पॉपुलर हैं. यहां तक कि प्रश्नोत्तर सत्र में अपनी बेटी के साथ आये एक पिता ने कहा- "मिस्टर बांड मैंने आपकी किताब नहीं पढ़ी है, लेकिन मेरी बेटी की आपसे मिलने की इतनी इच्छा थी कि मैं खुद को भी यहां आने से नहीं रोक पाया." लेकिन इतने बड़े शहर में क्या मात्र 500 से 600 लोग ही हैं, जिन्हें ऐसे कार्यक्रमों में शामिल होने की रुचि हो पायी?

मैं आठ दिसंबर को पूरे दिन और नौ दिसंबर को शाम तक लिटररी मीट में एक श्रोता के नाते मौजूद रहा. साहित्यकार उदय प्रकाश जी ने काफी अच्छी बातें कहीं. उन्होंने अपनी बात रखते हुए बाजार की तारीफ भी की. मैं वहां किसी भी तरह के पत्रकारीय धर्म के निर्वहन से इतर लेखक, कवि, वक्ताओं को सुनने व साहित्यिक वातावरण को जीने की उम्मीद से गया था. मैंने उसे जिया भी. बस इस 'मिलन' को 'उत्सव' बनते देखने की चाह मन में ही रह गयी.

डियर रांची, आपको लग रहा होगा कि मैं आपसे शिकायत लेकर बैठ गया हूं. मैं शिकायत नहीं, बस आपसे अपने मन की बात शेयर कर रहा हूं, क्योंकि आप में से जो लोग वहां पहुंचे थे. वे उस कार्यक्रम से खाली हाथ नहीं लौटे होंगे, मुझे पता है कि आप टोकरी भर संवेदना, संजीदगी, खुलापन और इंसानी स्नेह अपने साथ लेकर जरूर लौटे होंगे. अगर आपके पास भी कोई कहानी होगी, तो आप उसे कहने की तैयारी में भी जुट गये होंगे.

खैर, रांची में साहित्य उत्सव की इस पहल का यह महज दूसरा वर्ष था. मुझे पूरी उम्मीद है कि आगे आप ऐसे उत्सवों को अपने 'घर-परिवार के उत्सव' की तरह जरूर ट्रीट करेंगे. क्योंकि यह आयोजन भले टाटा के सौजन्य से हो रहा हो, लेकिन देशभर से आनेवाले अलग-अलग साहित्यकारों व कलाकारों के लिए यह रांची और रांची वालों का ही आयोजन होता है. 

हालांकि, दोनों दिन जो लोग आये, उनकी उत्साहजनक उपस्थिति हमेशा बनी रही. रेखा भारद्वाज जी ने जब आठ दिसंबर की रात को गाना शुरू किया, तो सर्द मौसम का एहसास भी जाता रहा. उन्होंने रांची के ऑडिएंस की काफी तारीफ भी की. सोचिए, अगर आप नहीं आये, तो उस तारीफ का हिस्सा बनने से भी वंचित रह गये. वहां रांची के कई गणमान्य लोग भी दिख रहे थे, लेकिन मैं ऐसे उत्सवों को आम लोगों का उत्सव बनते देखना चाहता हूं.

इस उत्सव में शामिल न होने भर से मैं आपके साहित्य प्रेम पर सवाल नहीं उठा रहा. बस आपसे कहना चाह रहा हूं कि जिस तरह एक शांतिप्रिय, तरक्कीपसंद समाज के लिए साहित्य बहुत जरूरी है. उसी तरह साहित्य को समृद्ध बनाने की जिम्मेवारी लेखकों के साथ-साथ पाठकों की भी है और ऐसे आयोजन लेखकों और पाठकों को एक-दूसरे के ज्यादा करीब लाते हैं। आशा है कि अगले लिटररी मीट में आपकी गर्मजोशी को मैं महसूस कर पाऊंगा.

सादर
आपका दोस्त विवेकानंद

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