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जुमला सरकार से छुटकारा पाने का विकल्प ढूंढ़ रही जनता!

अलग-अलग पार्टियों का किसी 'एक कारण' के लिए साथ आना कभी भी आसान काम नहीं होता है। लेकिन कई बार उन्हें साथ आना पड़ता है, क्योंकि उनके कार्यकर्ता और वोटर्स भी ऐसा चाहते हैं। आजकल देश भर में यह चर्चा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को रोकने के लिए कांग्रेस, सपा-बसपा, टीएमसी, राजद, टीडीपी, एनसीपी, आरएलएसपी जैसे  23 छोटे-बड़े ऐसे दल एक साथ आये हैं, जिनकी विचारधारा एकसमान नहीं है। यह बात आंशिक रूप से सच भी है। लेकिन इनमें से कुछ दल पहले भी यूपीए सरकार में साथ रह चुके हैं. इसके अलावा इन दलों में से ज्यादा का दायरा एक राज्य तक ही सीमित है.

लेकिन दूसरा सच यह भी है कि ये सारे दल 'झूठे प्रचार के सहारे चल रही एक सरकार' को रोकने आयी है। मौजूदा मोदी नित एनडीए सरकार जनपक्षधर होने का दावा तो करती है, लेकिन युवाओं के लिए इनके पास 'रोजगार' नहीं है। बड़े-बड़े मित्र उद्योगपतियों के लिए तो इस सरकार के पास 'कई ऑफर' हैं, लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए जीएसटी जैसा कठोर टैक्स सिस्टम। अपनी मजबूती दिखाने के चक्कर में बिना किसी होमवर्क के देश की जनता पर जीएसटी का बोझ डाल दिया गया। जब चीजें हाथ से बाहर जाती दिखीं, तो बार-बार टेक्स स्लैव में बदलाव किया गया। इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान हुआ, लाखों लोगों के जॉब्स छीन गये।

इन सबके अलवा डिफॉल्टर कारोबारी देश का पैसा गबन करके आसानी से देश के बाहर चले गये और सरकार को कानोंकान खबर तक नहीं हुई। नोटबंदी के बाद भी कुछ सरकारी बैंकों की हालत इतनी खराब है कि उनको बचाने के लिए आपस में मर्ज करने की नौबत आ गयी है। भ्रष्टाचार विरोधी नाव में सवार होकर सत्ता में आयी एनडीए सरकार के पांव खुद ही राफेल लाड़ाकू विमान मामले में फंसते जा रहे हैं। जब सत्ता में आ रहे थे तो कालाधन वापस लाने का खूब दावा किया था। आज उल्टे काला धन वाले फरार हो रहे हैं।

गरीब-किसान तो इस सरकार के मुख पर ऐसे बैठे हैं, जैसे वे साक्षात् सरस्वती हों. मोदी जी हर बात में गरीब और किसान का नाम न लें तो उनका खाना हजम न हो, लेकिन वही किसान जब अपनी मामूली मांगों को लेकर दिल्ली पहुंचते हैं, तो उन पर वाटर कैनन से हमला होता है, उन पर लाठीचार्ज किया जाता है। इस सरकार की पार्टी के बड़े-बड़े नेता-मंत्री सामाजिक और सांप्रदायिक भावना भड़काने वाले बयान देते रहते हैं, लोगों को पाकिस्तान भेजने की बात करते रहते हैं, देशभर में मॉब लिंचिंग का माहौल बन जाता है, गाय-गोबर के लिए लोगों को जान जाने तक पीटा जाता है, लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी चुप्पी साध लेते हैं। अब अगर ये मनमोहन सिंह होते तो एक बात समझ में आती कि वे मौन रहते थे। लेकिन मन की बात करने वाले पीएम ऐसे मौकों पर मौन क्यों धारण कर लेते हैं?

इन सबके बावजूद मोदी जी की 56 इंच की छाती की ताकत का रोज बखान होता रहता है। ऐसे में एक तरफ मीडिया पर दबाव भी है, तो दूसरी तरफ मीडिया का एक हिस्सा खुद इस सरकार की गोदी में बैठ कर गर्व महसूस कर रहे हैं। नरेंद्र मोदी की लीडरशीप वाली एनडीए सरकार इसलिए भी झूठी है, क्योंकि 2014 में एनडीए खुद 23 दलों का एक गठबंधन था। हां भले ही वे दल छोटे-छोटे रहे हों, लेकिन उनकी भी अपनी वोट ट्रांसफरिंग कैपेसिटी थी। कुछ तो क्षेत्रीय छत्रप हैं। फिर भी साढ़े चार साल से पूरे भाजपा के प्रचार तंत्र ने न सिर्फ इस एनडीए सरकार को 'मोदी सरकार' कह कर प्रचारित किया, बल्कि यह पूरी तरह से मोदी-शाह की सरकार बन कर रह गयी है। ऐसा मैं ही नहीं भाजपा के नेता व सांसद तक खुद कहते फिरते हैं। शत्रुघ्न सिन्हा, यशवंत सिन्हा, कीर्ति झा आजाद, सावित्री बाई फुले, अरुण शौरी जैसे भाजपाई सरकार के क्रियाकलापों की वजह से बगावत कर चुके हैं। वर्ष 2014 में सहयोगी रहे टीडीपी और आएलएसपी भी एनडीए का साथ छोड़ कर अब महागठबंधन हिस्सा बन चुके हैं।



हालांकि, मोदी सरकार को लेकर तर्क यह दिया जाता है कि 2014 में एनडीए की जीत मोदी के लीडरशीप की ही जीत थी। इस बात में सच्चाई भी है, लेकिन फिर 'सबका साथ-सबका विकास' का नारा देने की जरूरत क्या थी? यहां तक कि सरकार में मंत्री के पोर्टफोलियो वाले नेताओं ने मोदी-शाह की मनमानी की बात को स्वीकारा है। क्या यह एक तरह की तानाशाही नहीं है? आखिर 543 सांसद चुनने का मकसद क्या होता है? अगर सबकुछ प्रधानमंत्री को ही करना होता है, तो कैबिनेट की जरूरत ही क्या है? 

मीडिया में आजकल डिबेट का विषय होता है कि 'मोदी वर्सेज हू?' क्या हम प्रधानमंत्री चुनने के लिए वोट करते हैं? पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में हम 543 सांसद चुनते हैं। उनमें से बहुमत वाले दल किसी एक को अपना नेता चुनती है, जो देश का प्रधानमंत्री होता है। मौजूदा मोदी सरकार ने 2013 से ही देश के पिछले प्रधानमंत्रियों को इस कदर कोसा, जैसे लगा कि उनलोगों ने देश के लिए कुछ किया ही न हो। आइआइटी, इसरो, आइआइएम, एम्स जैसे संस्थान जैसे विश्वकर्मा जी खुद आ कर बना गये हों। देश के संवैधानिक संस्थानों पर हो रही सराकर की मनमानी की बातें पब्लिक डोमेन में आ चुकी हैं। आरबीआई, सीबीआई, ईडी, सुप्रीम कोर्ट जैसी संस्थाओं का भरोसा डोलता जा रहा है। चुनाव आयोग से पहले भाजपा आइटी सेल का चीफ चुनाव की डेट अनाउंस कर दे रहा है। यह लोकतंत्र के ताने-बाने पर हमला नहीं तो और क्या है?

अब इतने के बाद भी अगर मोदी सरकार देश का कायाकल्प कर देते, तो एक बात समझ में आती। लेकिन पिछले साढ़े चार वर्षों से 'हवाई जुमलों' के अलावा सरकार की जनपक्षीय उपलब्धियां नगण्य हैं। गंगा सफाई मिशन की स्थिति किसी छिपी नहीं है, लेकिन चकाचक वीडियो तैयार किया जा रहा कि हर जगह गंगा क्लीन हो गयी। उज्जवला योजना के तहत सिलेंडर तो बांटे गये, पर उनमें से मात्र 18 फीसदी लोगों ने दोबारा सिलिंडर रिफिल करवाये। स्किल इंडिया के नाम पर कंप्यूटर सेंटर का फर्जीवाड़ा पूरे देश में चल रहा है। मोदी जी ने तो स्टार्टअप इंडिया का नाम लेना ही छोड़ दिया है। रोजगार जेनरेशन के मामले में यह सरकार बुरी तरह फेल रही, यहां तक पुराने जॉब्स भी गये है। जब इन्हें लगा कि इनके कोर वोटर्स भी पलटी मार देंगे तो 'सवर्ण आरक्षण' का लॉलीपॉप लेकर यह सरकार मैदान में आ गयी। आप जोर से हंस सकते हैं कि 'गरीबी' के आधार पर दिये जा रहे इस आरक्षण की 'गरीबी रेखा' सालाना आठ लाख रुपये की आय और पांच एकड़ तक जमीन है। यह देश के गरीबों के साथ मजाक नहीं तो और क्या है?

भाजपा व उनके कार्यकर्ताओं द्वारा यह बात फैलायी जाती है कि विपक्षी दलों के पास नरेंद्र मोदी का विकल्प कहां है। यह असल में उनकी बौखलाहट है, क्योंकि चुनावी गणित का हाल उन्हें भी पता है। पिछले दिनों तीन भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिली हार से इनकी यह बौखलाहट और बढ़ गयी है। दरअसल, 2014 में एनडीए से भाजपा ने 427 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसमें 282 सीटों पर उनको जीत मिली, जो बहुमत के आंकड़े (272) से ज्यादा थी। लेकिन इतने दिनों में हुए अलग-अलग उपचुनाव में यह संख्या घटकर 268 तक आ पहुंची है। 2014 में भाजपा को मिले वोट पर्सेंट को भी देखा जाये तो वह 31.3 प्रतिशत था। वहीं उनकी सहयोगी शिवसेना को 1.9 प्रतिशत वोट मिले थे। यानी पूरी एनडीए की वोट परसेंट अगर 2014 के हिसाब से भी बनी रहती है, तो भी सीधी लड़ाई में उसे मिल कर हराया जा सकता है।

हम सभी जानते हैं कि लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में सर्वाधिक मत पाने वाला उम्मीदवार विजयी होता है। ऐसे में हर राज्य में 'एक कारण' के लिए बना गठबंधन मोदी सरकार को दिन में ही चांद और तारे दोनों दिखाने का हौसला रखती है। खास बात है कि भाजपा से बेहतर गठबंधन की ताकत को कौन समझ सकता है। क्योंकि दो सीटों से 272 सीटों का सफर उन्होंने गठबंधन के ही फॉर्मूले पर तय किया है। 

यहां नरेंद्र मोदी नित एनडीए सरकार से यही कहना चाहूंगा कि अगर पिछली सरकारों को कोसने, पंडित जवाहर लाल नेहरू व राजीव गांधी को नीचा दिखाने की जगह सरकार ने ईमानदारी से काम किया होता, तो आज मोदी जी को ये कहने की जरूरत ही न होती कि उन्हें हराने के लिए सारे चोर इकट्ठे हो गये हैं। साहब, जनता देश के चोरों को पहचानने लगी है। नीरव, माल्या, ललित जैसे लोगों को भी जनता देख रही है। ये सारे भगौड़े विदेश में चाय-पकौड़े का मजा ले रहे हैं और देश के पढ़े-लिखे युवाओं को आप पकौड़ा रोजगार योजना में भर्ती करना चाहते हैं। आपके राष्ट्रवाद का झूठा ढोल भी अब फट चुका है।

आपको तो चंद सवालों से इतना डर लगता है कि पूरे कार्यकाल में आपने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करना उचित नहीं समझा। यही सिर्फ मीडिया का अपमान नहीं, बल्कि देश की जनता व लोकतंत्र की संरचना का अपमान है। अपने पसंद के लोगों को तो कोई भी इंटरव्यू दे सकता है, उससे तो पीआर और मजबूत ही होता है। यह कोई समझे-न-समझे देश की जनता समझ रही है। आप भी इस बात को बखूबी समझ रहे हैं, इसलिए तो आपकी विधायक एक दलित नेता को नीचा दिखाने के लिए किन्नर कह देती है। 

आपका एक मंत्री कह देता है कि देश में प्रदर्शन के लिए 'जंतर-मंतर' न होता, तो देश सिंगापुर जैसा हो जाता। उस मंत्री को इस बात इल्म शायद न रहा हो कि आप भी उसी जंतर-मंतर पर संघर्ष कर सत्ता तक पहुंचे हैं। लेकिन लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि जिसे प्यार से जनता फर्श से अर्श तक ले जाती है, तो उसे फर्श पर पटकने में भी देर नहीं करती। आदरणीय प्रधानमंत्री जी इस देश की जनता रोजगार चाहती है, सद्भाव चाहती है, वह जुमलों से छुटकारे का विकल्प तलाश रही है, जैसे ही उसके सामने सक्षम विकल्प दिखेगा। वे अपनी ताकत को दिखाने में देर नहीं करेंगे।

विवेकानंद सिंह

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